Thursday, December 1, 2016

Kanwal Shared - अहं - December 01, 2016 at 10:24PM


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Kanwal Speaks - December 01, 2016 at 10:24PM


by अहं सत्य

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Kanwal Shared - अहं - December 01, 2016 at 10:24PM


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Kanwal Speaks - December 01, 2016 at 10:24PM


by अहं सत्य

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Kanwal Speaks - December 01, 2016 at 08:04PM

अमाननीय #सुप्रीम_कोर्ट जी, अदालतों में भी कार्यवाही के दौरान अंग्रेज़ी काले-गाउन की जगह #ख़ाकी_चड्डी पहनना अनिवार्य कर दीजिए; हो सके तो एक सर के ऊपर और दूसरी पतलून के ऊपर, पतलून भले न भी पहने तो भी चलेगा; और हाँ, एक ख़ाकी चड्डी #संविधान के ऊपर भी चढ़ा कर उस की सौगंध खिलाई जानी चाहिए, हर गवाही से पहले; बहुते राष्ट्रवादी कदम होगा ! #कंवल
by अहं सत्य

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Kanwal Speaks - December 01, 2016 at 08:03PM

अमाननीय #सुप्रीम_कोर्ट जी, अदालतों में भी कार्यवाही के दौरान अंग्रेज़ी काले-गाउन की जगह #ख़ाकी_चड्ढी पहनना अनिवार्य कर दीजिए; हो सके तो एक सर के ऊपर और दूसरी पतलून के ऊपर, पतलून भले न भी पहने तो भी चलेगा; और हाँ, एक ख़ाकी चड्डी #संविधान के ऊपर भी चढ़ा कर उस की सौगंध खिलाई जानी चाहिए, हर गवाही से पहले; बहुते राष्ट्रवादी कदम होगा ! #कंवल
by अहं सत्य

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Kanwal Speaks - December 01, 2016 at 03:58PM

सुप्रीम कोर्ट: तुम पर बहुत गंभीर आरोप हैं; क्या तुमने चोरी करने, डाका डालने, भ्रष्टाचार करने, कत्ल करने, बलात्कार करने और नरसंहार व नस्लघात करने से पहले खड़े होकर राष्ट्रीय गीत गाया था ? आरोपी: जी, माय लार्ड, एक दम सीधा खड़ा होकर पूरे 52 सैकेंड ! सुप्रीम कोर्ट: ये पक्का देशभक्त है, इसे बरी किया जाता है । #कंवल
by अहं सत्य

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Wednesday, November 30, 2016

Kanwal Speaks - November 30, 2016 at 10:07PM

#सबका_खड़ा_होना_अनिवार्य बा-हुक्म: #सुप्रीम_कोर्ट
by अहं सत्य

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Kanwal Speaks - November 30, 2016 at 10:04PM

Supreme Court of the country has continuously failed the people of India since 1947, however, specifically and most abusively in 1975, 1984, 1992, 2002 and today ! #Kanwal
by अहं सत्य

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Kanwal Speaks - November 30, 2016 at 09:47PM

हिंदुस्तान की नपुंसक सुप्रीम कोर्ट को अपने ही ख़ून-पसीने से की गई कमाई का पैसा बैंकों से बदलवाने के लिए भूखे पेट तड़पते कतारों में खड़े गरीब, मज़दूर और दिहाड़ीदार आम जनमानस की पिछले 20 दिनों में हो चुकी 80 से अधिक मौतों से बढ़कर एक तुच्छ से गाने के बजाने और न बजाने और उस पर सबका खड़ा होना अनिवार्य करने की ज़्यादा फ़िक्र है ??? लाहनत है इस देश के कागज़ी संविधान पर ... कार्यपालिका और विधायिका तो वैसे भी कचरे का डिब्बा थीं, अब तो मनुस्मृति के श्लोकों का गुणगान करने वाले इस घटिया और ज़लील देश की न्यायपालिका ने भी अपने आप को गटर की गंदगी साबित कर दिया है ! #कंवल
by अहं सत्य

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